दक्षिणीयमवगम्य पङ्क्तिशः
पङ्क्तिपावनमथ द्विजव्रजम् ।
दक्षिणः क्षितिपतिर्व्यशिश्रण-
द्दक्षिणाः सदसि राजसूयकीः ॥
दक्षिणीयमवगम्य पङ्क्तिशः
पङ्क्तिपावनमथ द्विजव्रजम् ।
दक्षिणः क्षितिपतिर्व्यशिश्रण-
द्दक्षिणाः सदसि राजसूयकीः ॥
पङ्क्तिपावनमथ द्विजव्रजम् ।
दक्षिणः क्षितिपतिर्व्यशिश्रण-
द्दक्षिणाः सदसि राजसूयकीः ॥
मल्लिनाथः
दक्षिणीयमिति ॥ अथानन्तरं दक्षिण औदार्यवान् । `दक्षिणे सरलोदारौ` इत्यमरः । क्षितिपती राजा । दक्षिणामर्हतीति दक्षिणीयो दक्षिणार्हः । `दक्षिणीयो दक्षिणार्हस्तत्र दक्षिण्य इत्यपि` इत्यमरः । `कडङ्करदक्षिणाच्छ च` (अष्टाध्यायी ५.१.६९ ) इति छप्रत्ययः । तं पङ्क्तेः स्वाधिष्ठितायाः पावनं पावयितारं पङ्क्तिपावनम् । पावयतेः कर्तरि ल्युट् । द्विजव्रजं ऋत्विग्वर्गमित्यर्थः । पङ्क्तिशः पङ्क्त्यनुसारेणाधिगम्य प्राप्य सदसि राजसूयकीः । राजसूयकाण्डोक्ता इत्यर्थः । दक्षिणाशब्दः स्फुटार्थः । राजसूयकीति दक्षिणार्थ एव ढको विधानात् । व्यशिश्रणद्विश्राणयति स्म । वितीर्णवानित्यर्थः । `विश्राणनं वितरणम्` इत्यमरः । `श्रण दाने` इति धातोः `णै चङ्युपधाया ह्रस्वः` (अष्टाध्यायी ७.४.१ ) । वृत्त्यनुप्रासोऽलंकारः
छन्दः
रथोद्धता [११: रनरलग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| द | क्षि | णी | य | म | व | ग | म्य | प | ङ्क्ति | शः |
| प | ङ्क्ति | पा | व | न | म | थ | द्वि | ज | व्र | जम् |
| द | क्षि | णः | क्षि | ति | प | ति | र्व्य | शि | श्र | ण |
| द्द | क्षि | णाः | स | द | सि | रा | ज | सू | य | कीः |
| र | न | र | ल | ग | ||||||
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