तत्र नित्यविहितोपहूतिषु
प्रोषितेषु पतिषु द्युयोषिताम् ।
गुम्फिताः शिरसि वेणयोऽभव-
न्न प्रफुल्लसुरपादपस्रजः ॥
तत्र नित्यविहितोपहूतिषु
प्रोषितेषु पतिषु द्युयोषिताम् ।
गुम्फिताः शिरसि वेणयोऽभव-
न्न प्रफुल्लसुरपादपस्रजः ॥
प्रोषितेषु पतिषु द्युयोषिताम् ।
गुम्फिताः शिरसि वेणयोऽभव-
न्न प्रफुल्लसुरपादपस्रजः ॥
मल्लिनाथः
तत्रेति ॥ तत्र क्रतौ नित्यं विहितोपहूतिषु कृताह्वानेषु पतिषु भर्तृषु इन्द्रादिषु प्रोषितेषु प्रवासं गतेषु । वसेः कर्तरि क्तः `वसतिक्षुधोः-` (अष्टाध्यायी ७.२.५२ ) इतीडागमः । द्युयोषितां स्वर्गस्त्रीणामिन्द्राण्यादीनां शिरसि वेणयो जटा एव गुम्फिता ग्रथिता अभवन् । प्रफुल्ला विकसिताः सुरपादपस्रजो मन्दारमाला न गुम्फिता अभवन् । अत्र सुरयोषितां वेण्यसंबन्धेऽपि संबन्धोक्तेः स्रक्संबन्धेऽप्यसंबन्धोक्तेश्च संबन्धेऽसंबन्धरूपा असंबन्धे संबन्धरूपा चातिशयोक्तिः । ताभ्यां च क्रतोरजस्रत्वं व्यज्यत इत्यलंकारेण वस्तुध्वनिः
छन्दः
रथोद्धता [११: रनरलग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| त | त्र | नि | त्य | वि | हि | तो | प | हू | ति | षु |
| प्रो | षि | ते | षु | प | ति | षु | द्यु | यो | षि | ताम् |
| गु | म्फि | ताः | शि | र | सि | वे | ण | यो | ऽभ | व |
| न्न | प्र | फु | ल्ल | सु | र | पा | द | प | स्र | जः |
| र | न | र | ल | ग | ||||||
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