उन्नमन्सपदि धूम्रयन्दिशः
सान्द्रतां दधदधःकृताम्बुदः ।
द्यामियाय दहनस्य केतनः
कीर्तयन्निव दिवौकसां प्रियम् ॥
उन्नमन्सपदि धूम्रयन्दिशः
सान्द्रतां दधदधःकृताम्बुदः ।
द्यामियाय दहनस्य केतनः
कीर्तयन्निव दिवौकसां प्रियम् ॥
सान्द्रतां दधदधःकृताम्बुदः ।
द्यामियाय दहनस्य केतनः
कीर्तयन्निव दिवौकसां प्रियम् ॥
मल्लिनाथः
&#३२; उन्नमन्निति ॥ सपदि होमक्षण एवोन्नमन्नुद्गच्छन् दिशो धूम्रयन् धूम्रवर्णाः कुर्वन् सान्द्रतां नीरन्ध्रतां दधत् अत एवाधःकृताम्बुदः शोभयावधीरितमेघो मेघोपरि गतश्च दहनस्याग्नेः केतनः केतुः । धूम इत्यर्थः । द्यौरोको येषां तेषां दिवौकसां देवानाम् । पृषोदरादित्वात्साधुः । अथवा दिवमोको येषामिति विग्रहः । `दिवं स्वर्गान्तरिक्षयोः` इति विश्वः । तेषां प्रियमिष्टं कीर्तयन् कथयन्निव कीर्तनहेतोरिव । कीर्तनार्थमिवेत्यर्थः । अत एव फलोत्प्रेक्षा । कीर्तयन्निति `लक्षणहेत्वोः क्रियायाः` (अष्टाध्यायी ३.२.१२६ ) इति हेत्वर्थे लटः शत्रादेशः । द्यामन्तरिक्षमियाय प्राप । इणो लिट्
छन्दः
रथोद्धता [११: रनरलग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| उ | न्न | म | न्स | प | दि | धू | म्र | य | न्दि | शः |
| सा | न्द्र | तां | द | ध | द | धः | कृ | ता | म्बु | दः |
| द्या | मि | या | य | द | ह | न | स्य | के | त | नः |
| की | र्त | य | न्नि | व | दि | वौ | क | सां | प्रि | यम् |
| र | न | र | ल | ग | ||||||
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