मल्लिनाथः
तमिति ॥ अथानन्तरं विष्टराविव श्रवसी यस्य स विष्टरश्रवाः कृष्णः । `विष्णुर्नारायणः कृष्णो वैकुण्ठो विष्टरश्रवाः` इत्यमरः । इति एतादृशं तं वदन्तं नृपम् । समस्तभूभृतः सर्वान्नृपाञ्श्रावयन् दशनांशुमण्डलमिति व्याजोऽपदेशो यस्य तेन&#३२; हारेण मुक्ताहारेण शबलं शारं वपुर्दधद्व्याजहार व्याहृतवान् । अत्र दशनांशुमण्डलस्य व्याजशब्देनासत्यत्वप्रतिपादनादपह्नवभेदः
छन्दः
रथोद्धता [११: रनरलग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| तं | व | द | न्त | मि | ति | वि | ष्ट | र | श्र | वाः |
| श्रा | व | य | न्न | थ | स | म | स्त | भू | भृ | तः |
| व्या | ज | हा | र | द | श | नां | शु | म | ण्ड | ल |
| व्या | ज | हा | र | श | ब | लं | द | ध | द्व | पुः |
| र | न | र | ल | ग | ||||||
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