सकले च तत्र गृहमागते हरौ
नगरेऽप्यकालमहमादिदेश सः ।
सततोत्सवं तदिति नूनन्मुन्मुदो
रभसेन विस्मृतमभून्महीभृतः ॥
सकले च तत्र गृहमागते हरौ
नगरेऽप्यकालमहमादिदेश सः ।
सततोत्सवं तदिति नूनन्मुन्मुदो
रभसेन विस्मृतमभून्महीभृतः ॥
नगरेऽप्यकालमहमादिदेश सः ।
सततोत्सवं तदिति नूनन्मुन्मुदो
रभसेन विस्मृतमभून्महीभृतः ॥
मल्लिनाथः
सकल इति ॥ किंचेति चार्थः । स राजा हरौ कृष्णे गृ २ हमागते सकले तत्र नगरे इन्द्रप्रस्थे । अकाले प्रसिद्धवसन्ताद्यतिरिक्ते काले । महमुत्सवम् । `मह उद्धव उत्सवः` इत्यमरः । आदिदेशाज्ञापयामास । नूनमत्रोत्प्रेक्ष्यते-उन्मुदः कृष्णागमनादुत्कटानन्दस्य महीभृतो धर्मनन्दनस्य तन्नगरं सततमुत्सवा यस्मिंस्तत्सततोत्सवमिति एतद्भसेन त्वरया विस्मृतमभूत् । अन्यथा कथं कृतकरणोपदेश इति भावः
छन्दः
मञ्जुभाषिणी [१३: सजसजग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| स | क | ले | च | त | त्र | गृ | ह | मा | ग | ते | ह | रौ |
| न | ग | रे | ऽप्य | का | ल | म | ह | मा | दि | दे | श | सः |
| स | त | तो | त्स | वं | त | दि | ति | नू | न | न्मु | न्मु | दो |
| र | भ | से | न | वि | स्मृ | त | म | भू | न्म | ही | भृ | तः |
| स | ज | स | ज | ग | ||||||||
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