हरिराकुमारमखिलाभिधानवि-
त्स्वजनस्य वार्तमयमयमन्वयुङ्क्त च ।
महतीमपि श्रियमवाप्य विस्मयः
सुजनो न विस्मरति जातु किञ्चन ॥
हरिराकुमारमखिलाभिधानवि-
त्स्वजनस्य वार्तमयमयमन्वयुङ्क्त च ।
महतीमपि श्रियमवाप्य विस्मयः
सुजनो न विस्मरति जातु किञ्चन ॥
त्स्वजनस्य वार्तमयमयमन्वयुङ्क्त च ।
महतीमपि श्रियमवाप्य विस्मयः
सुजनो न विस्मरति जातु किञ्चन ॥
छन्दः
मञ्जुभाषिणी [१३: सजसजग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ह | रि | रा | कु | मा | र | म | खि | ला | भि | धा | न | वि | ||
| त्स्व | ज | न | स्य | वा | र्त | म | य | म | य | म | न्व | यु | ङ्क्त | च |
| म | ह | ती | म | पि | श्रि | य | म | वा | प्य | वि | स्म | यः | ||
| सु | ज | नो | न | वि | स्म | र | ति | जा | तु | कि | ञ्च | न | ||
| स | ज | स | ज | ग | ||||||||||
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