हसितुं परेण परितः परिस्फुर-
त्करवालकोमलरुचावुपेक्षितैः ।
उदकर्षि यत्र जलशङ्कया जनै-
र्मुहुरिन्द्रनीलभुवि दूरमम्बरम् ॥
हसितुं परेण परितः परिस्फुर-
त्करवालकोमलरुचावुपेक्षितैः ।
उदकर्षि यत्र जलशङ्कया जनै-
र्मुहुरिन्द्रनीलभुवि दूरमम्बरम् ॥
त्करवालकोमलरुचावुपेक्षितैः ।
उदकर्षि यत्र जलशङ्कया जनै-
र्मुहुरिन्द्रनीलभुवि दूरमम्बरम् ॥
मल्लिनाथः
हसितुमिति ॥ यत्र सभायां परितः परिस्फुरन्ती करवालकोमला असिश्यामा रुचिर्यस्यास्तस्यामिन्द्रनीलभुवि हसितुं परेण जानतान्येन जनेनोपेक्षितैः स्थलमेतत्, न जलमित्युपदिष्टैर्जनैरज्ञैरागन्तुकजनैर्जलशङ्कया जलभ्रान्त्या मुहुरमम्बरं वस्त्रमुदकर्षि नितम्बादुद्धृतम् । अत्रेन्द्रनीलस्थलसादृश्यात्सलिलभ्रान्तेर्भ्रान्तिमदलंकारः
छन्दः
मञ्जुभाषिणी [१३: सजसजग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ह | सि | तुं | प | रे | ण | प | रि | तः | प | रि | स्फु | र |
| त्क | र | वा | ल | को | म | ल | रु | चा | वु | पे | क्षि | तैः |
| उ | द | क | र्षि | य | त्र | ज | ल | श | ङ्क | या | ज | नै |
| र्मु | हु | रि | न्द्र | नी | ल | भु | वि | दू | र | म | म्ब | रम् |
| स | ज | स | ज | ग | ||||||||
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