अभितः सदोऽथ हरिपाण्डवौ रथा-
दमलांशुमण्डलसमुल्लसत्तनू ।
अवतेरतुर्नयननन्दनौ नभः
शशिभार्गवावुदयपर्वतादिव ॥
अभितः सदोऽथ हरिपाण्डवौ रथा-
दमलांशुमण्डलसमुल्लसत्तनू ।
अवतेरतुर्नयननन्दनौ नभः
शशिभार्गवावुदयपर्वतादिव ॥
दमलांशुमण्डलसमुल्लसत्तनू ।
अवतेरतुर्नयननन्दनौ नभः
शशिभार्गवावुदयपर्वतादिव ॥
मल्लिनाथः
अभित इति ॥ अथामलांशुमण्डलेन तेजःपुञ्जेन समुल्लसन्त्यौ भासमाने तनू मूर्ती ययोस्तौ नयननन्दनौ नेत्रानन्दकरौ हरिपाण्डवौ सदोऽभितः सभाभिमुखम् । `अभितःपरित:-` (वा.) इति द्वितीया । रथात् शशिभार्गवौ अमलेत्यादिविशेषणविशिष्टौ शशिभार्गवौ चन्द्रशुक्रो नभोऽभितो नभोऽभिमुखमुदयाख्यात्पर्वतादुदयाचलादिव अवतरतुरवतीर्णवन्तौ । तरतेर्लिट् `तॄफलभजत्रपश्च` (अष्टाध्यायी ६.४.१२२ ) इत्येत्वाभ्यासलोपौ । उपमालङ्कारः
छन्दः
मञ्जुभाषिणी [१३: सजसजग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अ | भि | तः | स | दो | ऽथ | ह | रि | पा | ण्ड | वौ | र | था |
| द | म | लां | शु | म | ण्ड | ल | स | मु | ल्ल | स | त्त | नू |
| अ | व | ते | र | तु | र्न | य | न | न | न्द | नौ | न | भः |
| श | शि | भा | र्ग | वा | वु | द | य | प | र्व | ता | दि | व |
| स | ज | स | ज | ग | ||||||||
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