व्रजतोरपि प्रणयपूर्वमेकता-
मसुरारिपाण्डुसुतसैन्ययोस्तदा ।
ररुषे विषाणिभिरनुक्षणंमिथो
मदमूढबुद्धिषु विवेकिता कुतः ॥
व्रजतोरपि प्रणयपूर्वमेकता-
मसुरारिपाण्डुसुतसैन्ययोस्तदा ।
ररुषे विषाणिभिरनुक्षणंमिथो
मदमूढबुद्धिषु विवेकिता कुतः ॥
मसुरारिपाण्डुसुतसैन्ययोस्तदा ।
ररुषे विषाणिभिरनुक्षणंमिथो
मदमूढबुद्धिषु विवेकिता कुतः ॥
मल्लिनाथः
व्रजतोरिति ॥ तदा तस्मिन्समये असुरारिपाण्डुसुतसैन्ययोः हरिपार्थसैन्ययोः प्रणयपूर्व स्नेहपूर्वकमेकतामैक्यं व्रजतोर्गच्छतोः सतोरपि विषाणिभिरुभयसेनावर्तिभिः गजैरनुक्षणं प्रतिक्षणं मिथः परस्परं रुरुषे चुक्रुधे । भावे लिट् । तथा हि—मदेन मूढबुद्धिषु विपरीतप्रज्ञेषु प्राणिषु विवेकिता कार्याकार्यविचारिता कुतः । नास्त्येवेत्यर्थः । अथ तेषां स्वामिसौहार्देऽपि स्वयं विरोधिता न दोषायेति भावः । सामान्येन विशेषसमर्थनरूपोऽर्थान्तरन्यासः
छन्दः
मञ्जुभाषिणी [१३: सजसजग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| व्र | ज | तो | र | पि | प्र | ण | य | पू | र्व | मे | क | ता |
| म | सु | रा | रि | पा | ण्डु | सु | त | सै | न्य | यो | स्त | दा |
| र | रु | षे | वि | षा | णि | भि | र | नु | क्ष | णं | मि | थो |
| म | द | मू | ढ | बु | द्धि | षु | वि | वे | कि | ता | कु | तः |
| स | ज | स | ज | ग | ||||||||
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