द्रुतमध्वनन्नुपरि पाणिवृत्तयः
पणवा इवाश्वचरणक्षता भुवः ।
ननृतुश्च वारिधरधीरवारण-
ध्वनिहृष्टकूजितकलाः कलापिनः ॥
द्रुतमध्वनन्नुपरि पाणिवृत्तयः
पणवा इवाश्वचरणक्षता भुवः ।
ननृतुश्च वारिधरधीरवारण-
ध्वनिहृष्टकूजितकलाः कलापिनः ॥
पणवा इवाश्वचरणक्षता भुवः ।
ननृतुश्च वारिधरधीरवारण-
ध्वनिहृष्टकूजितकलाः कलापिनः ॥
मल्लिनाथः
द्रुतमिति ॥ अश्वचरणक्षतास्तुरगखुरताडिता भुव उपरि पृष्ठभागे पाणिवृत्तयः करताडनानि येषां ते उपरिपाणिवृत्तयः पणवा वाद्यविशेषा इवेत्युपमा । द्रुतं द्रुततरमेवाध्वनन् ध्वनन्ति स्म । द्रुतं शीघ्रम्` इत्यमरः । वारिधरशब्देन तद्गर्जितं लक्ष्यते । तद्वद्धीरैर्गम्भीरैः वारणध्वनिभिर्गजबृंहणैर्हृष्टा अत एव कूजितकलाः । कलकूजिता इत्यर्थः । ततो विशेषणसमासः । कलापा येषां सन्तीति कलापिनो बर्हि&#३२; णश्च ननृतुः नृत्यन्ति स्म । अत्रोपमयोः संसृष्टिः । वारिधरोपमया कलापिनां गजबृंहितेषु घनगर्जितभ्रान्तिमन्तरेण नृत्यासंभवाभ्द्रान्तिमदलंकारो व्यज्यत इत्यलंकारेणालंकारध्वनिः
छन्दः
मञ्जुभाषिणी [१३: सजसजग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| द्रु | त | म | ध्व | न | न्नु | प | रि | पा | णि | वृ | त्त | यः |
| प | ण | वा | इ | वा | श्व | च | र | ण | क्ष | ता | भु | वः |
| न | नृ | तु | श्च | वा | रि | ध | र | धी | र | वा | र | ण |
| ध्व | नि | हृ | ष्ट | कू | जि | त | क | लाः | क | ला | पि | नः |
| स | ज | स | ज | ग | ||||||||
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