निलयेषुनक्तमसिताश्मनां चयै-
र्बिसिनीवधूपरिभवस्पुटागसः ।
मुहरत्रसद्भिरपि यत्र गौरवा-
च्छशलाञ्छनांशव उपांशु जध्निरे ॥
निलयेषुनक्तमसिताश्मनां चयै-
र्बिसिनीवधूपरिभवस्पुटागसः ।
मुहरत्रसद्भिरपि यत्र गौरवा-
च्छशलाञ्छनांशव उपांशु जध्निरे ॥
र्बिसिनीवधूपरिभवस्पुटागसः ।
मुहरत्रसद्भिरपि यत्र गौरवा-
च्छशलाञ्छनांशव उपांशु जध्निरे ॥
छन्दः
मञ्जुभाषिणी [१३: सजसजग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| नि | ल | ये | षु | न | क्त | म | सि | ता | श्म | नां | च | यै |
| र्बि | सि | नी | व | धू | प | रि | भ | व | स्पु | टा | ग | सः |
| मु | ह | र | त्र | स | द्भि | र | पि | य | त्र | गौ | र | वा |
| च्छ | श | ला | ञ्छ | नां | श | व | उ | पां | शु | ज | ध्नि | रे |
| स | ज | स | ज | ग | ||||||||
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