वलयार्पितासितमहोपलप्रभा-
बहुलीकृतप्रतनुरोमराजिना ।
हरिवीक्षणाक्षणिकचक्षुषान्यया
करपल्लवेन गलदम्बरं दधे ॥
वलयार्पितासितमहोपलप्रभा-
बहुलीकृतप्रतनुरोमराजिना ।
हरिवीक्षणाक्षणिकचक्षुषान्यया
करपल्लवेन गलदम्बरं दधे ॥
बहुलीकृतप्रतनुरोमराजिना ।
हरिवीक्षणाक्षणिकचक्षुषान्यया
करपल्लवेन गलदम्बरं दधे ॥
मल्लिनाथः
वलयेति ॥ हरिवीक्षणेऽक्षणिकचक्षुषा स्थिरदृष्ट्या । विस्मयादराभ्यां स्तिमितनेत्रयेत्यर्थः । अन्यया स्त्रिया गलत्सुखपारवश्यात्स्रंसमानमम्बरं वलयेष्वर्पिताः खचिता ये असितमहोपला नीलमहामणयः । `उपलौ मणिपाषाणौ` इति विश्वः । तेषां प्रभाभिर्बहुलीकृता सान्द्रीकृता प्रतनुः सूक्ष्मा रोमराज़िर्यस्य तेन करपल्लवेन दधे धृतम् । अयं च तात्कालिकविहारलक्षणविलासः । अत्रेन्द्रनीलप्रभाणां रोमावलीबहुलीकरणोक्त्या प्रभास्वपि रोमराजित्वप्रतीतेर्भ्रान्तिमदलंकारो व्यज्यते इति वस्तुनालंकारध्वनिः
छन्दः
मञ्जुभाषिणी [१३: सजसजग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| व | ल | या | र्पि | ता | सि | त | म | हो | प | ल | प्र | भा |
| ब | हु | ली | कृ | त | प्र | त | नु | रो | म | रा | जि | ना |
| ह | रि | वी | क्ष | णा | क्ष | णि | क | च | क्षु | षा | न्य | या |
| क | र | प | ल्ल | वे | न | ग | ल | द | म्ब | रं | द | धे |
| स | ज | स | ज | ग | ||||||||
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