परिपाटलाब्जदलचारुणासकृ-
च्चलिताङ्गुलीकिसलयेन पाणिना ।
सशिरःप्रकम्पमपरा रिपुं मधो-
रनुदीर्णवर्णनिभृतार्थमाह्वयत् ॥
परिपाटलाब्जदलचारुणासकृ-
च्चलिताङ्गुलीकिसलयेन पाणिना ।
सशिरःप्रकम्पमपरा रिपुं मधो-
रनुदीर्णवर्णनिभृतार्थमाह्वयत् ॥
च्चलिताङ्गुलीकिसलयेन पाणिना ।
सशिरःप्रकम्पमपरा रिपुं मधो-
रनुदीर्णवर्णनिभृतार्थमाह्वयत् ॥
मल्लिनाथः
परीति ॥ अपरा स्त्री परिपाटलाजदलचारुणा रक्ताब्जपत्ररुचिरेण असकृन्मुहुश्चलितान्यङ्गुल्यः किसलयानीवाङ्गुलीकिसलयानि यस्य तेन पाणिना सशिरःप्रकम्पं शिरःकम्पयुक्तं यथा तथा मधो रिपुं हरिमनुदीर्णवर्णमनुच्चारिताक्षरम् अत एव निभृतार्थं परेषामप्रकाशितार्थं च यत्तदनुदीर्णवर्णनिभृतार्थं यथा तथा आह्वयत् । परप्रकाशनभयादव्याहरन्ती चेष्टयैवाह्वानं कृतवतीत्यर्थः । अत्रापि पूर्ववद्विलासोपमे भावालंकारौ
छन्दः
मञ्जुभाषिणी [१३: सजसजग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| प | रि | पा | ट | ला | ब्ज | द | ल | चा | रु | णा | स | कृ |
| च्च | लि | ता | ङ्गु | ली | कि | स | ल | ये | न | पा | णि | ना |
| स | शि | रः | प्र | क | म्प | म | प | रा | रि | पुं | म | धो |
| र | नु | दी | र्ण | व | र्ण | नि | भृ | ता | र्थ | मा | ह्व | यत् |
| स | ज | स | ज | ग | ||||||||
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