अधिकोन्नमद्घनपयोधरं मुहुः
प्रचलत्कलापिकलशङ्खकस्वना ।
अभिकृष्णमङ्गुलिमुखेन काचन
द्रुतमेककर्णविवरं व्यघट्टयत् ॥
अधिकोन्नमद्घनपयोधरं मुहुः
प्रचलत्कलापिकलशङ्खकस्वना ।
अभिकृष्णमङ्गुलिमुखेन काचन
द्रुतमेककर्णविवरं व्यघट्टयत् ॥
प्रचलत्कलापिकलशङ्खकस्वना ।
अभिकृष्णमङ्गुलिमुखेन काचन
द्रुतमेककर्णविवरं व्यघट्टयत् ॥
मल्लिनाथः
अधिकेति ॥ काचन काचित् कान्ता अभिकृष्णं कृष्णाभिमुखम् । आभिमुखेऽव्ययीभावः । अधिकं भुजोन्नमनाभृशमुन्नमन् घनः कठिणः पयोधरः स्तनो यस्याः सा मुहुः प्रचलतो नृत्यतः कलापिनो बर्हिण इव कलो मधुरः शङ्खकस्वनो वलयध्वनिर्यस्याः सा सती । `शङ्खकं वलये कम्बौ` इति विश्वः । अङ्गुलिमुखेनानाङ्गुल्यग्रेणैकस्य कर्णस्य विवरं रन्धं द्रुतं शीघ्रं व्यघट्टयत् । कण्डूविनोदार्थमिवाताडयत् । वस्तुतस्तु भावाविष्करणार्थमेवेति भावः । अयं च पूर्ववद्विलास एव । कलापिकलेत्युपमा
छन्दः
मञ्जुभाषिणी [१३: सजसजग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अ | धि | को | न्न | म | द्घ | न | प | यो | ध | रं | मु | हुः |
| प्र | च | ल | त्क | ला | पि | क | ल | श | ङ्ख | क | स्व | ना |
| अ | भि | कृ | ष्ण | म | ङ्गु | लि | मु | खे | न | का | च | न |
| द्रु | त | मे | क | क | र्ण | वि | व | रं | व्य | घ | ट्ट | यत् |
| स | ज | स | ज | ग | ||||||||
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