विपुलेन सागरशयस्यकुक्षिणा
भुवनानि यस्य पपिरे युगक्षये ।
मदविभ्रमासकलया पपे पुनः
स पुरस्त्रियैकतमयैकया दृशा ॥
विपुलेन सागरशयस्यकुक्षिणा
भुवनानि यस्य पपिरे युगक्षये ।
मदविभ्रमासकलया पपे पुनः
स पुरस्त्रियैकतमयैकया दृशा ॥
भुवनानि यस्य पपिरे युगक्षये ।
मदविभ्रमासकलया पपे पुनः
स पुरस्त्रियैकतमयैकया दृशा ॥
मल्लिनाथः
विपुलेनेति ॥ युगक्षये कल्पान्ते । सागरे शेते इति सागरशयस्य । `अधिकरणे शेतेः` (अष्टाध्यायी ३.२.१५ ) इत्यच्प्रत्ययः । `शयवासवासिष्वकालात्` (अष्टाध्यायी ६.३.१८ ) इति विकल्पादलुगभावः । यस्य हरेर्विपुलेन कुक्षिणा भुवनानि पपिरे पीतानि । पिबतेः कर्मणिं लिट् । स हरिरेकतमया पुरस्त्रिया पुनः कयाचित्पौराङ्गनया मदविभ्रमेण मदविकारेणासकलया असमग्रया एकया दृशा पपे पीतः । सतृष्णं दृष्ट इत्यर्थः । कुक्षिकोणनिविष्टनिखिलविष्टपस्य हरेर्महत आधेयस्यात्यल्पतरैककान्ताकटाक्षकोणाधारत्वोक्त्या चमत्कारोधिकालंकारः । `आधाराधेययोरानुरूप्याभावोsधिको मतः` इति लक्षणात् । अयं च तात्कालिकविकारात्मा विलासाख्यो भावो यत्कटाक्षवीक्षणम् । `तात्कालिको विशेषः स्याद्विलासोऽङ्गक्रियादिषु` (२।३०) इति दशरूपकात्
छन्दः
मञ्जुभाषिणी [१३: सजसजग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| वि | पु | ले | न | सा | ग | र | श | य | स्य | कु | क्षि | णा |
| भु | व | ना | नि | य | स्य | प | पि | रे | यु | ग | क्ष | ये |
| म | द | वि | भ्र | मा | स | क | ल | या | प | पे | पु | नः |
| स | पु | र | स्त्रि | यै | क | त | म | यै | क | या | दृ | शा |
| स | ज | स | ज | ग | ||||||||
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