मल्लिनाथः
अधीति ॥ उच्चकैर्निजनिकेतं स्वसौधमधिरूढया आरूढवत्या पवनेनावधूतः कम्पितो वसनान्तो वस्त्राञ्चलो यस्यास्तया एकया कदाचिदङ्गनया हेतुना तन्नगरमिन्द्रप्रस्थं माधवे उपयात्यागच्छति । यातेर्लटः शत्रादेशः। पताकया वैजयन्त्या विहितोपशोभं कृतशोभमिवालंकृतमिवेत्युत्प्रेक्षा । व्यरोचत व्यराजत । कृत्स्नस्यापि नगरस्य स्वयं पताकेव बभावित्युत्प्रेक्षा । तस्याः सकलपौराङ्गनातिशायि लावण्यं व्यज्यत` इत्यलंकारेण वस्तुध्वनिः । अत्रापि प्रासादारोहणं पूर्मवत्कुतूहलमेव
छन्दः
मञ्जुभाषिणी [१३: सजसजग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अ | धि | रू | ढ | या | नि | ज | नि | के | त | मु | च्च | कैः |
| प | व | ना | व | धू | त | व | स | ना | न्त | यै | क | या |
| वि | हि | तो | प | शो | भ | मु | प | या | ति | मा | ध | वे |
| न | ग | रं | व्य | रो | च | त | प | ता | क | ये | व | तत् |
| स | ज | स | ज | ग | ||||||||
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