अधिरुक्ममन्दिरगवाक्षमुल्लस-
त्सदृशो रराज मुरजिद्दिदृक्षया ।
वदनारविन्दमुदयाद्रिकन्दरा-
विवरोदरस्थतमिवेन्दुमण्डलम् ॥
अधिरुक्ममन्दिरगवाक्षमुल्लस-
त्सदृशो रराज मुरजिद्दिदृक्षया ।
वदनारविन्दमुदयाद्रिकन्दरा-
विवरोदरस्थतमिवेन्दुमण्डलम् ॥
त्सदृशो रराज मुरजिद्दिदृक्षया ।
वदनारविन्दमुदयाद्रिकन्दरा-
विवरोदरस्थतमिवेन्दुमण्डलम् ॥
मल्लिनाथः
अधीति ॥ मुरजितो हरेर्दिदृक्षया द्रष्टुमिच्छया । दृशेः समन्तात् `अ प्रत्ययात्` (अष्टाध्यायी ३.३.१०२ ) इति स्त्रियामप्रत्यये टाप् । रुक्ममन्दिरस्य कनकहर्म्यस्य गवाक्षेऽधिरुक्ममन्दिरगवाक्षम्। विभक्त्यर्थेऽव्ययीभावः। उल्लसत्प्रकाशमानं सुदृशः स्त्रिया वदनारविन्दमुदयाद्रेः कन्दराया गुहाया विवरस्योदरे मध्ये स्थितमिन्दुमण्डलमिव रराजेत्युपमा । अत्रापि सुदृशो गवाक्षाक्रमणस्य रम्यदर्शनार्थचापलरूपत्वात्कुतूहलं मुरजिद्दिदृक्षयेत्यादिना व्यक्तमेव
छन्दः
मञ्जुभाषिणी [१३: सजसजग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अ | धि | रु | क्म | म | न्दि | र | ग | वा | क्ष | मु | ल्ल | स |
| त्स | दृ | शो | र | रा | ज | मु | र | जि | द्दि | दृ | क्ष | या |
| व | द | ना | र | वि | न्द | मु | द | या | द्रि | क | न्द | रा |
| वि | व | रो | द | र | स्थ | त | मि | वे | न्दु | म | ण्ड | लम् |
| स | ज | स | ज | ग | ||||||||
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