करयुग्मपद्ममुकुलापवर्जितैः
प्रतिवेश्म लाजकुसमैरवाकिरन् ।
अवदीर्णशुक्तिपुटमुक्तमौक्तिक-
प्रकरैरिव प्रियरथाङ्गमङ्गनाः ॥
करयुग्मपद्ममुकुलापवर्जितैः
प्रतिवेश्म लाजकुसमैरवाकिरन् ।
अवदीर्णशुक्तिपुटमुक्तमौक्तिक-
प्रकरैरिव प्रियरथाङ्गमङ्गनाः ॥
प्रतिवेश्म लाजकुसमैरवाकिरन् ।
अवदीर्णशुक्तिपुटमुक्तमौक्तिक-
प्रकरैरिव प्रियरथाङ्गमङ्गनाः ॥
मल्लिनाथः
करेति ॥ प्रतिवेश्म वेश्मनि । विभक्त्यर्येऽव्ययीभावः । अङ्गनाः पुरंध्र्यः । करयुग्मान्यञ्जलयस्तानि पद्ममुकुलानीवेत्युपमितसमासः । तैरपवर्जितैरावजितैरत एवावदीर्णैर्विभिन्नैः शुक्तिपुटैः शुक्तिकोशैर्मुक्ता उत्सृष्टा ये मौक्तिकप्रकरा मुक्तानिकरास्तैरिव स्थितैरित्युत्प्रेक्षा । लाजाः, कुसुमानीव तैर्लाजकुसुमैः । आचारलाजैरित्यर्थः । प्रियं रथाङ्गं चक्रं यस्य तं प्रियरथाङ्गं चक्रिणम् । हरिमित्यर्थः । अवाकिरन व्याक्षिपन् , मङ्गलार्थमित्यर्थः
छन्दः
मञ्जुभाषिणी [१३: सजसजग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| क | र | यु | ग्म | प | द्म | मु | कु | ला | प | व | र्जि | तैः |
| प्र | ति | वे | श्म | ला | ज | कु | स | मै | र | वा | कि | रन् |
| अ | व | दी | र्ण | शु | क्ति | पु | ट | मु | क्त | मौ | क्ति | क |
| प्र | क | रै | रि | व | प्रि | य | र | था | ङ्ग | म | ङ्ग | नाः |
| स | ज | स | ज | ग | ||||||||
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