व्यचलन्विशङ्कटकटीरकस्थली-
शिखरस्खलन्मुखरमेखलाकुलाः ।
भवनानि तुङ्गतपनीयसंक्रम-
क्रमणक्वणत्कनकनूपुराः स्त्रियः ॥
व्यचलन्विशङ्कटकटीरकस्थली-
शिखरस्खलन्मुखरमेखलाकुलाः ।
भवनानि तुङ्गतपनीयसंक्रम-
क्रमणक्वणत्कनकनूपुराः स्त्रियः ॥
शिखरस्खलन्मुखरमेखलाकुलाः ।
भवनानि तुङ्गतपनीयसंक्रम-
क्रमणक्वणत्कनकनूपुराः स्त्रियः ॥
मल्लिनाथः
व्यचलन्निति ॥ विशङ्कटानां विशालानां कटीरकस्थलीनां कटिभागानां शिखरेष्वग्रेषु स्खलन्त्यो लुठन्त्योऽत एव मुखराः शब्दायमानास्ताभिर्मेखलाभिराकुलाः तुङ्गेषु तपनीयसंक्रमेषु कनकसोपानेषु क्रमणेन क्वणन्तः कनकनूपुरा यासां ताः स्त्रियः भवनानि हर्म्याणि व्यचलन् । तत्र गत्वारोहन्नित्यर्थः । चलेर्गत्याल्लङ् । एतदपि पूर्ववदतिकुतूहलमेव । वृत्त्यनुप्रासोऽलंकारः
छन्दः
मञ्जुभाषिणी [१३: सजसजग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| व्य | च | ल | न्वि | श | ङ्क | ट | क | टी | र | क | स्थ | ली |
| शि | ख | र | स्ख | ल | न्मु | ख | र | मे | ख | ला | कु | लाः |
| भ | व | ना | नि | तु | ङ्ग | त | प | नी | य | सं | क्र | म |
| क्र | म | ण | क्व | ण | त्क | न | क | नू | पु | राः | स्त्रि | यः |
| स | ज | स | ज | ग | ||||||||
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