असकृद्गृहीतबहुदेहसम्भव-
स्तदसौ विभक्तनवगोपुरान्तरम् ।
पुरुषः पुरं प्रविशति स्म पञ्चभिः
सममिन्द्रियैरिव नरेन्द्रसूनुभिः ॥
असकृद्गृहीतबहुदेहसम्भव-
स्तदसौ विभक्तनवगोपुरान्तरम् ।
पुरुषः पुरं प्रविशति स्म पञ्चभिः
सममिन्द्रियैरिव नरेन्द्रसूनुभिः ॥
स्तदसौ विभक्तनवगोपुरान्तरम् ।
पुरुषः पुरं प्रविशति स्म पञ्चभिः
सममिन्द्रियैरिव नरेन्द्रसूनुभिः ॥
मल्लिनाथः
असकृदिति ॥ असकृद्धहुशो गृहीतो लोकधारणाय स्वीकृतो बहुषु देहेषु मत्स्यकूर्मादिषु शरीरेषु संभवः प्रादुर्भावो येन सः, अन्यत्र स्वकर्मणा प्राक्तनयोनिसंबन्धरूपसंभव इत्यर्थः । असौ पुरुषः पुराणपुरुषो हरिर्जीवश्च विभक्तानि नवानि प्रत्यग्राणि गोपुरान्तराणि द्वारविशेषा यस्य तत् , अन्यत्र नवसंख्याकानि गोपुरान्तराणीन्द्रियद्वारभेदा यस्मिंस्तत् पुरं पत्तनं शरीरं च । `पुरं पुरि शरीरे च`&#३२; इति विश्वः । पञ्चभिरिन्द्रियैः सममिव पञ्चभिर्नरेन्द्रसूनुभी राजपुत्रैः पाण्डवैः सहासौ हरिस्तत्पुरं प्रविशति स्म । जीवो हि देहादेहान्तरं पूर्वेन्द्रियैः सह प्रविशति । लिङ्गशरीरस्यानपायादिति भावः । श्लेषसंकीर्णेयमुपमा
छन्दः
मञ्जुभाषिणी [१३: सजसजग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अ | स | कृ | द्गृ | ही | त | ब | हु | दे | ह | स | म्भ | व |
| स्त | द | सौ | वि | भ | क्त | न | व | गो | पु | रा | न्त | रम् |
| पु | रु | षः | पु | रं | प्र | वि | श | ति | स्म | प | ञ्च | भिः |
| स | म | मि | न्द्रि | यै | रि | व | न | रे | न्द्र | सू | नु | भिः |
| स | ज | स | ज | ग | ||||||||
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