प्रतिनादपूरितदिगन्तरः पत-
न्पुरगोपुरं प्रति स सैन्यसागरः ।
रुरुचे हिमाचलगुहामुखोन्मुखः
पयसां प्रवाह इव सौरसैन्धवः ॥
प्रतिनादपूरितदिगन्तरः पत-
न्पुरगोपुरं प्रति स सैन्यसागरः ।
रुरुचे हिमाचलगुहामुखोन्मुखः
पयसां प्रवाह इव सौरसैन्धवः ॥
न्पुरगोपुरं प्रति स सैन्यसागरः ।
रुरुचे हिमाचलगुहामुखोन्मुखः
पयसां प्रवाह इव सौरसैन्धवः ॥
मल्लिनाथः
प्रतीति ॥ प्रतिनादैः प्रतिध्वानैः पूरितं व्यासं दिशामन्तरमन्तरालं येन सः पुरगोपुरं पुरद्वारं प्रति । `गोपुरं तु पुरद्वारि द्वारमात्रे नपुंसकम्` इति विश्वः । एवं च न परशब्दस्य पौनरुक्त्यशङ्का । पतन धावन् स सैन्यसागरः सेनासमुद्रः हिमाचलगुहामुखस्योन्मुखोऽभिमुखः सुरसिन्धोर्गङ्गाया अयं सौरसैन्धवः । `हृद्भगसिन्ध्वन्ते पूर्वपदस्य च` (अष्टाध्यायी ७.३.१९ ) इत्युभयपदवृद्धिः । पयसां प्रवाह इव रुरुचे रेजे । उपमालंकारः
छन्दः
मञ्जुभाषिणी [१३: सजसजग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| प्र | ति | ना | द | पू | रि | त | दि | ग | न्त | रः | प | त |
| न्पु | र | गो | पु | रं | प्र | ति | स | सै | न्य | सा | ग | रः |
| रु | रु | चे | हि | मा | च | ल | गु | हा | मु | खो | न्मु | खः |
| प | य | सां | प्र | वा | ह | इ | व | सौ | र | सै | न्ध | वः |
| स | ज | स | ज | ग | ||||||||
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