विकसत्कलायकुसुमासितद्युते-
रलघूडुपाण्डु जगतामधीशितुः ।
यमुनाह्रदोपरिगहंसमण्डल-
द्युतिजिष्णु जिष्णुरभृतोष्णवारणम् ॥
विकसत्कलायकुसुमासितद्युते-
रलघूडुपाण्डु जगतामधीशितुः ।
यमुनाह्रदोपरिगहंसमण्डल-
द्युतिजिष्णु जिष्णुरभृतोष्णवारणम् ॥
रलघूडुपाण्डु जगतामधीशितुः ।
यमुनाह्रदोपरिगहंसमण्डल-
द्युतिजिष्णु जिष्णुरभृतोष्णवारणम् ॥
मल्लिनाथः
विकसदिति ॥ विकसत्कलायकुसुमं कालपुष्पम् । `कलायः स्यात्काले` इति वैजयन्ती । तद्वदसितद्युतेर्नीलवर्णस्य जगतामधीशितुर्जगन्नाथस्य हरेः जिष्णुरर्जुनः अलघूडुपाण्डु स्थूलनक्षत्रधवलम् अत एव यमुनाहदस्योपरिगमुपरिगतम् । `अन्यत्रापि दृश्यते` (वा०) इति डप्रत्ययः । तस्य हंसमण्डलस्य द्युतिं शोभां जिष्णु जयनशीलम् । `ग्लाजिस्थश्च-` (अष्टाध्यायी ३.२.१३९ ) इति ग्स्नुः । उष्णवारणमातपत्रमभृत भृतवान् । भृञः कर्तरि लुङ् । `स्वरितञितः-` (अष्टाध्यायी १.३.७२ ) इत्यात्मनेपदम् । "उश्च` (अष्टाध्यायी १.२.१२ ) इति सिचः कित्त्वादगुणता `हस्वादङ्गात्` (अष्टाध्यायी ८.२.२७ ) इति सकारलोपः । अत्राप्युपमासंकरः
छन्दः
मञ्जुभाषिणी [१३: सजसजग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| वि | क | स | त्क | ला | य | कु | सु | मा | सि | त | द्यु | ते |
| र | ल | घू | डु | पा | ण्डु | ज | ग | ता | म | धी | शि | तुः |
| य | मु | ना | ह्र | दो | प | रि | ग | हं | स | म | ण्ड | ल |
| द्यु | ति | जि | ष्णु | जि | ष्णु | र | भृ | तो | ष्ण | वा | र | णम् |
| स | ज | स | ज | ग | ||||||||
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