यदुभर्तुरागमनलब्धजन्मनः
प्रमदादमानिव पुरे महीयसि ।
सहसा ततः स सहितोऽनुजन्मभि-
र्वसुधाधिपोऽभिमुखमस्यनिर्ययौ ॥
यदुभर्तुरागमनलब्धजन्मनः
प्रमदादमानिव पुरे महीयसि ।
सहसा ततः स सहितोऽनुजन्मभि-
र्वसुधाधिपोऽभिमुखमस्यनिर्ययौ ॥
प्रमदादमानिव पुरे महीयसि ।
सहसा ततः स सहितोऽनुजन्मभि-
र्वसुधाधिपोऽभिमुखमस्यनिर्ययौ ॥
मल्लिनाथः
यदुभर्तुरिति ॥ ततो हरेर्यमुनोत्तरणश्रवणानन्तरं स वसुधाधिपो धर्मराजः यदुभर्तुर्हरेरागमनेन लब्धजन्मनो लब्धोदयात् । जातादित्यर्थः । प्रमदाद्धर्षात् । `प्रमदसंमदौ हर्षे` (अष्टाध्यायी ३.३.६८ ) इत्यप्प्रत्ययान्तो निपातः । महीयस्यतिविपुलेऽपि पुरे &#३२; अमान् हर्षकृतशरीरवृद्धेरिवापरिमितविकासः सन्नित्युत्प्रेक्षा । सहसा अनुजन्मभिरनुजैः सहितोऽस्य हरेरभिमुखं निर्ययौ । नगरान्निर्गत इत्यर्थः
छन्दः
मञ्जुभाषिणी [१३: सजसजग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| य | दु | भ | र्तु | रा | ग | म | न | ल | ब्ध | ज | न्म | नः |
| प्र | म | दा | द | मा | नि | व | पु | रे | म | ही | य | सि |
| स | ह | सा | त | तः | स | स | हि | तो | ऽनु | ज | न्म | भि |
| र्व | सु | धा | धि | पो | ऽभि | मु | ख | म | स्य | नि | र्य | यौ |
| स | ज | स | ज | ग | ||||||||
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