यमुनामतीतमथ शुश्रुवानमु-
मुं तपसस्तनूज इति नाधुनोच्यते ।
स यदाचलन्निजपुरादहर्निशं
नृपतेस्तदादि समचारि वार्तया ॥
यमुनामतीतमथ शुश्रुवानमु-
मुं तपसस्तनूज इति नाधुनोच्यते ।
स यदाचलन्निजपुरादहर्निशं
नृपतेस्तदादि समचारि वार्तया ॥
मुं तपसस्तनूज इति नाधुनोच्यते ।
स यदाचलन्निजपुरादहर्निशं
नृपतेस्तदादि समचारि वार्तया ॥
मल्लिनाथः
यमुनामिति ॥ अथ यमुनातरणानन्तरं तपसस्तनूजो धर्मनन्दनः अधुना यमुनामतीतममुं हरिं शुश्रुवान् । `भाषायां सदवसश्रुवः` (अष्टाध्यायी ३.२.१०८ ) इति क्कसुप्रत्ययः । इति नोच्यते किंतु स हरिर्यदा निजपुरादचलत् तच्चलनमादिर्यस्मिन्कर्मणि तत्तदादि तत्प्रभृति अहश्च निशा चाहर्निशम् । समाहारे द्वन्द्वैकवद्भावे अत्यन्तसंयोगे द्वितीया । नृपतेर्धर्मराजस्य वार्तया इह निविष्ट इतो निर्गत इति वृत्तान्तेन समचारि संचरितम् , आगतमिति यावत् । भावे लुङ् । संनिहितयमुनातरणवृत्तान्तवव्द्यवहितसकलदैनंदिनवृत्तान्तो निजनगरप्रस्थानाव्प्रभृति प्रतिक्षणमागत एवेत्यर्थः । अस्मिन्सर्गे मञ्जुभाषिणी वृत्तम् । `सजसा जगौ भवति मञ्जुभाषिणी` इति लक्षणात्
छन्दः
मञ्जुभाषिणी [१३: सजसजग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| य | मु | ना | म | ती | त | म | थ | शु | श्रु | वा | न | मु | |
| मुं | त | प | स | स्त | नू | ज | इ | ति | ना | धु | नो | च्य | ते |
| स | य | दा | च | ल | न्नि | ज | पु | रा | द | ह | र्नि | शं | |
| नृ | प | ते | स्त | दा | दि | स | म | चा | रि | वा | र्त | या | |
| स | ज | स | ज | ग | |||||||||
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