शिरसि स्म जिघ्रति सुरारिबन्धने
छलवामनं विनयवामनं तदा ।
यशसेव वीर्यविजितामरद्रुम-
प्रसवेन वासितशिरोरुहे नृपः ॥
शिरसि स्म जिघ्रति सुरारिबन्धने
छलवामनं विनयवामनं तदा ।
यशसेव वीर्यविजितामरद्रुम-
प्रसवेन वासितशिरोरुहे नृपः ॥
छलवामनं विनयवामनं तदा ।
यशसेव वीर्यविजितामरद्रुम-
प्रसवेन वासितशिरोरुहे नृपः ॥
मल्लिनाथः
शिरसीति ॥ नृपो धर्मराजः सुरारिबन्धने पुरा बलिबन्धने छलवामनं&#३२; कपटवामनं तदा पार्थोपपत्तिसमये तु विनयवामनम् । विनयनम्रमित्यर्थः ।तं हरिमिति शेषः । वीर्यविजितामरद्रुमप्रसवेन पारिजातहरणे शौर्यलब्धपारिजातकुसुमेन यशसेव पारिजातविजयप्रसूतया कीर्त्येवेल्युत्प्रेक्षा । वासितशिरोरुहे सुरभितकेशे शिरसि जिघ्रति स्म । `प्रवासादेत्य मूर्धन्यवघ्राणम्` इति स्मरणात् । पुरा किल भगवान्सत्यभामाप्रीतये बलादिन्द्रलोकादपहृत्य पारिजातं निजगृहेष्वारोपितवानिति कथात्रानुसंधेया
छन्दः
मञ्जुभाषिणी [१३: सजसजग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| शि | र | सि | स्म | जि | घ्र | ति | सु | रा | रि | ब | न्ध | ने |
| छ | ल | वा | म | नं | वि | न | य | वा | म | नं | त | दा |
| य | श | से | व | वी | र्य | वि | जि | ता | म | र | द्रु | म |
| प्र | स | वे | न | वा | सि | त | शि | रो | रु | हे | नृ | पः |
| स | ज | स | ज | ग | ||||||||
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