भग्नद्रुमाश्चक्रुरितस्ततो
दिशः समुल्लसत्केतननाकुल्-
आः पिष्टाद्रिपृष्ठास्तरसा च दन्-
तिनश्चलन्निजाङ्गाचलदुर्गमा भुव्-
अः
भग्नद्रुमाश्चक्रुरितस्ततो
दिशः समुल्लसत्केतननाकुल्-
आः पिष्टाद्रिपृष्ठास्तरसा च दन्-
तिनश्चलन्निजाङ्गाचलदुर्गमा भुव्-
अः
दिशः समुल्लसत्केतननाकुल्-
आः पिष्टाद्रिपृष्ठास्तरसा च दन्-
तिनश्चलन्निजाङ्गाचलदुर्गमा भुव्-
अः
मल्लिनाथः
भग्नेति ॥ दन्तिनो गजा इतस्ततो भग्नद्रुमाः स्वभग्नाखिलवृक्षा दिशः समुल्लसद्भिः केतनैरेव काननैराकुलाः संकीर्णाश्चक्रुः । तथा तरसा बलेन पिष्टानि चूर्णितान्यद्रिपृष्ठानि यासु ता भुवो भूमीः चलद्भिर्निजाङ्गैरेवाचलैः दुर्गमा दुष्प्रापाश्चक्रुः । अत्र केतनेष्वङ्गेषु च काननाचलत्वरूपणाद्रूपकालंकारः । तेन गजानां पुरातनसृष्टिसंहारेण सृष्ट्यन्तरप्रवर्तनरूपं लोकोत्तरं सामर्थ्यं गम्यत इत्यलंकारेण वस्तुध्वनिः
छन्दः
इन्द्रवज्रा [११: ततजगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| भ | ग्न | द्रु | मा | श्च | क्रु | रि | त | स्त | तो | दि | ||
| शः | स | मु | ल्ल | स | त्के | त | न | ना | कु | लाः | ||
| पि | ष्टा | द्रि | पृ | ष्ठा | स्त | र | सा | च | द | न्ति | ||
| न | श्च | ल | न्नि | जा | ङ्गा | च | ल | दु | र्ग | मा | भु | वः |
| त | त | ज | ग | ग | ||||||||
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