लीलाचलत्स्त्रीचरणारुणोत्पल-
स्खलत्तुलाकोटिनिनादकोमलः ।
शौरेरुपानूपमापाहरन्मनः
स्वनान्तरादुन्मदसारसारवः ॥
लीलाचलत्स्त्रीचरणारुणोत्पल-
स्खलत्तुलाकोटिनिनादकोमलः ।
शौरेरुपानूपमापाहरन्मनः
स्वनान्तरादुन्मदसारसारवः ॥
स्खलत्तुलाकोटिनिनादकोमलः ।
शौरेरुपानूपमापाहरन्मनः
स्वनान्तरादुन्मदसारसारवः ॥
मल्लिनाथः
लीलेति ॥ अनुगता आपो येषु ते अनूपा जलप्राया देशाः । `जलप्रायमनूपं स्यात्पुंसि कच्छस्तथाविधः` इत्यमरः । `प्रादिभ्यो धातुजस्य वाच्यो वा चोत्तरपदलोपश्च` (वा०) इति बहुव्रीहिः `ऋक्पू:-` (अष्टाध्यायी ५.४.७४ ) इत्यदिना समासान्तः `ऊदनोर्देशे` (अष्टाध्यायी ६.३.९८ ) इत्यूकारः । तेषां समीपे उपानूपम् । समीपार्थेऽव्ययीभावः । लीलया चलति चलनशीले स्त्रियाश्चरणे अरुणोत्पले इव तयोः स्खलन्त्यौ ये तुलाकोटी नूपुरौ । `पादाङ्गदं तुलाकोटिर्मञ्जीरो नूपुरोऽस्त्रियाम्` इत्यमरः । तयोर्निनाद इव कोमलो मधुर उन्मदसारसारवः मत्तहंसकूजितम् । `चक्राङ्गसारसौ हंसे` इति शब्दार्णवे । शौरेर्मनः स्वनान्तरादपाहरत् । अत्र मनोहरणस्य लीलेत्यादिविशेषणार्थहेतुकत्वादुपमासंकीर्णं काव्यलिङ्गम्
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ली | ला | च | ल | त्स्त्री | च | र | णा | रु | णो | त्प | ल |
| स्ख | ल | त्तु | ला | को | टि | नि | ना | द | को | म | लः |
| शौ | रे | रु | पा | नू | प | मा | पा | ह | र | न्म | नः |
| स्व | ना | न्त | रा | दु | न्म | द | सा | र | सा | र | वः |
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