शौरेः प्रतापोपनतैरितस्ततः
समागतैः प्रश्रयनम्रमूर्तिभिः ।
एकातपत्रा पृथिवीभृतां गणै-
रभूदबहुच्छात्रतया पताकिनी ॥
शौरेः प्रतापोपनतैरितस्ततः
समागतैः प्रश्रयनम्रमूर्तिभिः ।
एकातपत्रा पृथिवीभृतां गणै-
रभूदबहुच्छात्रतया पताकिनी ॥
समागतैः प्रश्रयनम्रमूर्तिभिः ।
एकातपत्रा पृथिवीभृतां गणै-
रभूदबहुच्छात्रतया पताकिनी ॥
मल्लिनाथः
शौरेरिति ॥ शौरेः कृष्णस्य पताकिनी सेना । व्रीह्यादित्वादिनिः । प्रतापेन हरितेजसा उपनतैर्नम्रैः । विधेयैरित्यर्थः । अत एवेतस्ततः समागतैः पार्श्वदेशादागतैः प्रश्रयनम्रमूर्तिभिर्हरिसंनिधौ विनयनम्रविग्रहैः पृथिवीभृतां राज्ञां गणैर्हेतुना बहुच्छत्रतया असंख्यातातपत्रवत्तया निमित्तेन एकानि केवलान्यातपत्राणि यस्याः सा एकातपत्रा केवलातपत्रमय्यभूत् । आतपत्रातिरिक्तं न किंचिदलक्ष्यतेत्यर्थः । `एके मुख्यान्यकेवलाः` इत्यमरः । बहुच्छत्राप्येकच्छत्रेति विरोधभासनाद्विरोधाभासोऽलंकारः
छन्दः
इन्द्रवंशा [१२: ततजर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| शौ | रेः | प्र | ता | पो | प | न | तै | रि | त | स्त | तः | |
| स | मा | ग | तैः | प्र | श्र | य | न | म्र | मू | र्ति | भिः | |
| ए | का | त | प | त्रा | पृ | थि | वी | भृ | तां | ग | णै | |
| र | भू | द | ब | हु | च्छा | त्र | त | या | प | ता | कि | नी |
| त | त | ज | र | |||||||||
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