ऋज्वीर्दधानैरवतत्य कन्धरा-
श्चलावचूडाः कलाघर्घररारवैः ।
भूमिर्महत्यप्यविलम्बितक्रमं
क्रमेलकैस्तक्षणमेव चिच्छिदे ॥
ऋज्वीर्दधानैरवतत्य कन्धरा-
श्चलावचूडाः कलाघर्घररारवैः ।
भूमिर्महत्यप्यविलम्बितक्रमं
क्रमेलकैस्तक्षणमेव चिच्छिदे ॥
श्चलावचूडाः कलाघर्घररारवैः ।
भूमिर्महत्यप्यविलम्बितक्रमं
क्रमेलकैस्तक्षणमेव चिच्छिदे ॥
मल्लिनाथः
ऋज्वीरिति ॥ ऋज्वीरवक्राः चलावचूडाः चलितकण्ठभूषणाः । `शिरःशिखाभूषणेषु चूडा` इति यादवः । चलितशिरस इति वा । कंधराः शिरोधरा अवतत्य वितत्य दधानः कलघर्घरारवैः । `घर्घरा क्षुद्रघण्टा स्यात्` इति शाश्वतः । अथवा घर्घरारव इति शब्दानुकरणम् । क्रमेलकैरुष्ट्रैः अविलम्बितक्रमम् , क्रमः पदक्षेपः । द्रुतपादक्षेपं यथा तथा महत्यपि भूमिस्तत्क्षणमेव चिच्छिदेऽतिक्रान्ता । स्वभावोक्तिः
छन्दः
इन्द्रवंशा [१२: ततजर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ऋ | ज्वी | र्द | धा | नै | र | व | त | त्य | क | न्ध | रा | |
| श्च | ला | व | चू | डाः | क | ला | घ | र्घ | र | रा | र | वैः |
| भू | मि | र्म | ह | त्य | प्य | वि | ल | म्बि | त | क्र | मं | |
| क्र | मे | ल | कै | स्त | क्ष | ण | मे | व | चि | च्छि | दे | |
| त | त | ज | र | |||||||||
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