तूर्ण प्रणेत्रा कृतनादमुच्च-
कैः प्रणोदितं वेसरयुग्मध्वनि ।
आत्मीयनेमिक्षतसान्द्रमेदि-
नीरजश्चयाक्रान्तभयादिवाद्रवत् ॥
तूर्ण प्रणेत्रा कृतनादमुच्च-
कैः प्रणोदितं वेसरयुग्मध्वनि ।
आत्मीयनेमिक्षतसान्द्रमेदि-
नीरजश्चयाक्रान्तभयादिवाद्रवत् ॥
कैः प्रणोदितं वेसरयुग्मध्वनि ।
आत्मीयनेमिक्षतसान्द्रमेदि-
नीरजश्चयाक्रान्तभयादिवाद्रवत् ॥
मल्लिनाथः
तूर्णमिति ॥ प्रणेत्रा सारथिना प्रणोदितं गमनाय प्रेरितम् । अत एव उच्चकैरुच्चैस्तरां कृतनादं यथा तथा वेसरयुग्यम् । संकराश्वो वेसरः । वेसराभ्यां युग्यं शकटमात्मीयनेमिः स्वचक्रधारा तया क्षतस्य सान्द्रस्य मेदिनीरजसश्चयेन समूहेन यदाक्रमणं तद्भयादिव तूर्णमध्वन्यद्रवत् । आत्मीयनेमिसमुद्भूतधूलिजालेनास्पृष्टं सत् द्रुतमगमदित्यर्थः
छन्दः
इन्द्रवज्रा [११: ततजगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| तू | र्ण | प्र | णे | त्रा | कृ | त | ना | द | मु | च्च | ||
| कैः | प्र | णो | दि | तं | वे | स | र | यु | ग्म | ध्व | नि | |
| आ | त्मी | य | ने | मि | क्ष | त | सा | न्द्र | मे | दि | ||
| नी | र | ज | श्च | या | क्रा | न्त | भ | या | दि | वा | द्र | वत् |
| त | त | ज | ग | ग | ||||||||
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