क्षितितटशयनान्तादुत्थितं दानपङ्ग-
प्लुतबहुलशरीरं शाययत्येष भूयः ।
मृदुचलदपरान्तोदीरितान्दूनिनादं
गजपतिमधिरोहः पक्षकव्यत्ययेन ॥
क्षितितटशयनान्तादुत्थितं दानपङ्ग-
प्लुतबहुलशरीरं शाययत्येष भूयः ।
मृदुचलदपरान्तोदीरितान्दूनिनादं
गजपतिमधिरोहः पक्षकव्यत्ययेन ॥
प्लुतबहुलशरीरं शाययत्येष भूयः ।
मृदुचलदपरान्तोदीरितान्दूनिनादं
गजपतिमधिरोहः पक्षकव्यत्ययेन ॥
मल्लिनाथः
क्षितीति ॥ क्षितितटं भूतलमेव शयनान्तः शयनस्थानं तस्मादुत्थितम् । सुप्तोत्थितमित्यर्थः । अत एव दानपङ्कप्लुतबहुलशरीरं मदकर्दमोक्षितमहाकायं गजपतिमेषोऽधिरोहतीत्यधिरोह आरोहणः । पचाद्यच् । मृदु मन्दं चलता अपरान्तेन पश्चिमपादेनोदीरित उत्पादितोऽन्दूनिनादः शृङ्खलारवो यस्मिन्कर्मणि तद्यथा तथा । पक्ष एव पक्षकः पार्श्वः । `पक्षः पार्श्वगरुत्साध्यसहायबलभित्तिषु` इति वैजयन्ती । तस्य व्यत्ययेन । पार्श्वान्तरेणेत्यर्थः। भूयः शाययति शयनं कारयति । `गतिबुद्धि-` (अष्टाध्यायी १.४.५२ ) इत्यादिना अणि कर्तुः कर्मत्वम् । स्वभावोक्तिरलंकारः
छन्दः
मालिनी [१५: ननमयय]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| क्षि | ति | त | ट | श | य | ना | न्ता | दु | त्थि | तं | दा | न | प | ङ्ग |
| प्लु | त | ब | हु | ल | श | री | रं | शा | य | य | त्ये | ष | भू | यः |
| मृ | दु | च | ल | द | प | रा | न्तो | दी | रि | ता | न्दू | नि | ना | दं |
| ग | ज | प | ति | म | धि | रो | हः | प | क्ष | क | व्य | त्य | ये | न |
| न | न | म | य | य | ||||||||||
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