सरसिजवनकान्तं बिभ्रदभ्रान्तवृत्तिः
करनयनसहस्रं हेतुमालोकशक्तेः ।
अखिलमतिमहिम्ना लोकमाक्रान्तवन्तं
हरिरिव हरिदश्वः साधु वृत्रं हिनस्ति ॥
सरसिजवनकान्तं बिभ्रदभ्रान्तवृत्तिः
करनयनसहस्रं हेतुमालोकशक्तेः ।
अखिलमतिमहिम्ना लोकमाक्रान्तवन्तं
हरिरिव हरिदश्वः साधु वृत्रं हिनस्ति ॥
करनयनसहस्रं हेतुमालोकशक्तेः ।
अखिलमतिमहिम्ना लोकमाक्रान्तवन्तं
हरिरिव हरिदश्वः साधु वृत्रं हिनस्ति ॥
मल्लिनाथः
सरसीति ॥ सरसि जातानि सरसिजानि । `सप्तम्यां जनेर्डः` (अष्टाध्यायी ३.२.९७ ) । तत्पुरुषे कृति बहुलम्` (अष्टाध्यायी ६.३.१४ ) इत्यलुक् । तद्वनस्य कान्तं प्रियम्, अन्यत्र तद्वत्कान्तं रम्यं आलोकशक्तेर्लोकलोचनानां विषयग्रहणशक्तेर्हेतुं आलोकान्तरसहकृतानामेव तेषां तत्सामर्थ्यात्, अन्यत्र आलोकशक्तेर्दर्शनव्यापारस्य हेतुम् । दर्शनसाधनमित्यर्थः । करा नयनानीव, अन्यत्र करा इव नयनानि तेषां सहस्रं करनयनसहस्रं बिभ्रत् । अभ्रान्ते नभोमध्ये वृत्तिर्यस्य सोऽभ्रान्तवृत्तिः । अन्यत्राभ्रान्ते मेघे वृत्तिर्यस्य सः । मेघवाहन इत्यर्थः । `अभ्रं नभः स्वर्गबलाहकेषु` इति विश्वः । हरितोऽश्वो यस्य स हरिदश्वोऽर्कः हरिरिन्द्र इवातिमहिम्नातिमहत्तया । स्ववृद्ध्येत्यर्थः । लोकमाक्रान्तवन्तं व्याप्तवन्तं एकत्र प्रत्यक्षादन्यत्र `स इषुमात्रमिषुमात्रं विष्वग्वर्धते । स इमाँल्लोकानावृणोत्` इत्यागमादिति भावः । वृत्रं ध्वान्तं दानवं च त्वाष्ट्रं साधु हिनस्ति हन्ति । `ध्वान्तारिदानवा वृत्राः` इत्यमरः उपमा श्लेषो वा मतभेदात्
छन्दः
मालिनी [१५: ननमयय]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| स | र | सि | ज | व | न | का | न्तं | बि | भ्र | द | भ्रा | न्त | वृ | त्तिः |
| क | र | न | य | न | स | ह | स्रं | हे | तु | मा | लो | क | श | क्तेः |
| अ | खि | ल | म | ति | म | हि | म्ना | लो | क | मा | क्रा | न्त | व | न्तं |
| ह | रि | रि | व | ह | रि | द | श्वः | सा | धु | वृ | त्रं | हि | न | स्ति |
| न | न | म | य | य | ||||||||||
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