सितरुचिशयनीये नक्तमेकान्तमुक्तं
दिनकरकरसङ्गव्यक्तकौसुम्भकान्ति ।
निजमिति रतिबन्धोर्जानतीमुत्तरीयं
परिहसति सखी स्त्रीमाददानां दिनादौ ॥
सितरुचिशयनीये नक्तमेकान्तमुक्तं
दिनकरकरसङ्गव्यक्तकौसुम्भकान्ति ।
निजमिति रतिबन्धोर्जानतीमुत्तरीयं
परिहसति सखी स्त्रीमाददानां दिनादौ ॥
दिनकरकरसङ्गव्यक्तकौसुम्भकान्ति ।
निजमिति रतिबन्धोर्जानतीमुत्तरीयं
परिहसति सखी स्त्रीमाददानां दिनादौ ॥
मल्लिनाथः
सितेति ॥ नक्तं रात्रौ शयनीये तल्पे । एकान्तमुक्तमत्यन्तत्यक्तं सितरुचि शुभ्रवर्णम् । किंतु दिनादौ प्रभाते दिनकरकरसङ्गेनार्कांशुव्यतिकरेण व्यक्ता कौसुम्भी कुसुम्भस्य रागद्रव्यस्य संबन्धिनी कान्तिर्यस्य तत्तथा भासमानं रतिबन्धोः प्रियस्योत्तरीयं निजमात्मीयमिति जानतीम् । अत एवाददानां स्त्रीनायिकाम् । `वाम्शसोः` (अष्टाध्यायी ६.४.८० ) इतीयङभावपक्षे `अमि पूर्वः` (अष्टाध्यायी ६.१.१०७ ) इति पूर्वरूपम् । सखी परिहसति । अत्राकौसुम्भे कौसुम्भभ्रमात् सादृश्यनिबन्धनाद्भ्रान्तिमदलंकारः
छन्दः
मालिनी [१५: ननमयय]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| सि | त | रु | चि | श | य | नी | ये | न | क्त | मे | का | न्त | मु | क्तं |
| दि | न | क | र | क | र | स | ङ्ग | व्य | क्त | कौ | सु | म्भ | का | न्ति |
| नि | ज | मि | ति | र | ति | ब | न्धो | र्जा | न | ती | मु | त्त | री | यं |
| प | रि | ह | स | ति | स | खी | स्त्री | मा | द | दा | नां | दि | ना | दौ |
| न | न | म | य | य | ||||||||||
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