अधिरजनि वधूभिः पीतमैरेयरिक्तं
कनकचषकमेतद्रोचनालोहितेन ।
उदयदहिमरोचिर्ज्योतिषाक्रान्तमन्त-
र्मधुन इव तथैवापूर्णमद्यापि भाति ॥
अधिरजनि वधूभिः पीतमैरेयरिक्तं
कनकचषकमेतद्रोचनालोहितेन ।
उदयदहिमरोचिर्ज्योतिषाक्रान्तमन्त-
र्मधुन इव तथैवापूर्णमद्यापि भाति ॥
कनकचषकमेतद्रोचनालोहितेन ।
उदयदहिमरोचिर्ज्योतिषाक्रान्तमन्त-
र्मधुन इव तथैवापूर्णमद्यापि भाति ॥
मल्लिनाथः
अधीति ॥ अधिरजनि रजन्याम् । विभक्त्यर्थेऽव्ययीभावः । वधूभिः पीतं मैरेयं मद्यं यस्य तत् अत एव रिक्तं पीतमैरेयरिक्तं एतत्कनकचषकं स्वर्णस्य पानपात्रम् । अवयवषष्ठ्या विकारार्थता । `चषकोऽस्त्री पानपात्रम्` इत्यमरः । रोचनालोहितेन गोरोचनारुणेन उदयत उदीयमानस्य अहिमरोचिषोऽर्कस्य ज्योतिषा तेजसा अन्तरभ्यन्तर आक्रान्तं व्याप्तं सत् अद्यापि इदानीमपि तथैव पूर्ववदेव&#३२; मधुन आपूर्णमिव । सामान्यषष्ठ्या योग्यविशेषपर्यवसाननियमात् `षष्ठी शेषे` (अष्टाध्यायी २.३.५० ) इति संबन्धसामान्ये षष्ठी करणस्यापि कारणत्वादिति । भाति शोभते । अत्रातपाक्रान्ते मधुपूर्णत्वोपेक्षया आतपे मधुभ्रमाद्भ्रान्तिमान् व्यज्यते
छन्दः
मालिनी [१५: ननमयय]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अ | धि | र | ज | नि | व | धू | भिः | पी | त | मै | रे | य | रि | क्तं |
| क | न | क | च | ष | क | मे | त | द्रो | च | ना | लो | हि | ते | न |
| उ | द | य | द | हि | म | रो | चि | र्ज्यो | ति | षा | क्रा | न्त | म | न्त |
| र्म | धु | न | इ | व | त | थै | वा | पू | र्ण | म | द्या | पि | भा | ति |
| न | न | म | य | य | ||||||||||
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