विततपृथुवरत्रातुल्यरूपैर्मयूखैः
कलश इव गरीयान्दिग्भिराकृष्यमाणः ।
कृतचपलविहङ्गालापकोलाहलाभि-
र्जलनिधिजलमध्यादेष उत्तार्यतेर्ऽकः ॥
विततपृथुवरत्रातुल्यरूपैर्मयूखैः
कलश इव गरीयान्दिग्भिराकृष्यमाणः ।
कृतचपलविहङ्गालापकोलाहलाभि-
र्जलनिधिजलमध्यादेष उत्तार्यतेर्ऽकः ॥
कलश इव गरीयान्दिग्भिराकृष्यमाणः ।
कृतचपलविहङ्गालापकोलाहलाभि-
र्जलनिधिजलमध्यादेष उत्तार्यतेर्ऽकः ॥
मल्लिनाथः
विततेति ॥ वितताभिः प्रसारिताभिः पृथुवरत्राभिर्महारज्जुभिः तुल्यरूपैस्तुल्याकारैः मयूखैः किरणैः गरीयान् कलश इवाकृष्यमाणः सन्नेषोऽर्कः कृतश्चपलः सत्वरो विहंगालाप एव कोलाहलः कलकलो याभिस्ताभिः दिग्भिर्जलनिधेः जलमध्यादुत्तार्यते उद्ध्रियते । तरतेर्ण्यन्तात्कर्मणि लट् । यथा कुतश्चित्कूपात्कुम्भः पाशैराकृष्य सकलकलं बहुभिः स्त्रीभिरुद्ध्रियते तद्वदिति भावः । अत्र वरत्रातुल्यरूपैः कलश इवेति चोपमाभ्यां विहंगालापकोलाहलेति रूपकेण चोज्जीवितार्कस्य दिक्कर्तृकोत्तारणोत्प्रेक्षा व्यञ्जकाप्रयोगात्प्रतीयमानेति संकरः
छन्दः
मालिनी [१५: ननमयय]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| वि | त | त | पृ | थु | व | र | त्रा | तु | ल्य | रू | पै | र्म | यू | खैः |
| क | ल | श | इ | व | ग | री | या | न्दि | ग्भि | रा | कृ | ष्य | मा | णः |
| कृ | त | च | प | ल | वि | ह | ङ्गा | ला | प | को | ला | ह | ला | भि |
| र्ज | ल | नि | धि | ज | ल | म | ध्या | दे | ष | उ | त्ता | र्य | ते | र्ऽकः |
| न | न | म | य | य | ||||||||||
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