प्रेक्षणीयकमेव क्षणमास-
न्ह्रीविभङ्गुरविलोचनपाताः ।
संभ्रमद्रुतगृहीतदुकूल-
च्छाद्यमानवपुषः सुरतान्ताः ॥
प्रेक्षणीयकमेव क्षणमास-
न्ह्रीविभङ्गुरविलोचनपाताः ।
संभ्रमद्रुतगृहीतदुकूल-
च्छाद्यमानवपुषः सुरतान्ताः ॥
न्ह्रीविभङ्गुरविलोचनपाताः ।
संभ्रमद्रुतगृहीतदुकूल-
च्छाद्यमानवपुषः सुरतान्ताः ॥
मल्लिनाथः
प्रेक्षणीयकमिति ॥ ह्रिया विभङ्गुराः स्खलिता विलोचनपाता दृष्टिपाता येषु ते संभ्रमेण द्रुतं गृहीतेन दुकूलेन छाद्यमानानि वपूंषि अन्तरङ्गाणि येषु ते सुरतान्ताः सुरतावसानानि क्षणं प्रेक्षणीयकं दृश्यमिवासन्नित्युपमा । नाटकादिरूपकेष्वाहार्यकं वस्तु तदृश्यं प्रेक्षणीयकमिति चोच्यते । इहाविर्भावतिरोधानादिना तत्तुल्यत्वम्
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| प्रे | क्ष | णी | य | क | मे | व | क्ष | ण | मा | स |
| न्ह्री | वि | भ | ङ्गु | र | वि | लो | च | न | पा | ताः |
| सं | भ्र | म | द्रु | त | गृ | ही | त | दु | कू | ल |
| च्छा | द्य | मा | न | व | पु | षः | सु | र | ता | न्ताः |
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