प्रप्यते स्म गतचित्रकचित्रै-
श्चत्रमार्द्रनखलक्ष्मकपोलैः ।
दध्रिरेऽथ रभसच्युतपु-
ष्पाः स्वबिन्दुकुसुमान्यलकान्ताः ॥
प्रप्यते स्म गतचित्रकचित्रै-
श्चत्रमार्द्रनखलक्ष्मकपोलैः ।
दध्रिरेऽथ रभसच्युतपु-
ष्पाः स्वबिन्दुकुसुमान्यलकान्ताः ॥
श्चत्रमार्द्रनखलक्ष्मकपोलैः ।
दध्रिरेऽथ रभसच्युतपु-
ष्पाः स्वबिन्दुकुसुमान्यलकान्ताः ॥
मल्लिनाथः
प्राप्यत इति ॥ गतानि विमर्दात्प्रमृष्टानि चित्रकचित्राणि तमालपत्ररचनानि येषां तैः कपोलैरार्द्रं यन्नखलक्ष्म तदेव चित्रमिति रूपकम् । प्राप्यते स्म प्राप्तम् । किं च रभसेन रतिसंभ्रमेण च्युतपुष्पा अलकान्ताश्चूर्णकुन्तलाग्राणि स्वेदबिन्दुनेव कुसुमानीति रूपकम् । दधिरे दधुः । धरतेर्भौवादिकाल्लिटि जित्त्वादात्मनेपदम् । स्वेदोऽत्र श्रमानुभवः । `श्रमः खेदोऽध्वरत्यादेः श्वासस्वेदातिभूमिकृत्
छन्दः
स्वागता [११: रनभगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| प्र | प्य | ते | स्म | ग | त | चि | त्र | क | चि | त्रै |
| श्च | त्र | मा | र्द्र | न | ख | ल | क्ष्म | क | पो | लैः |
| द | ध्रि | रे | ऽथ | र | भ | स | च्यु | त | पु | |
| ष्पाः | स्व | बि | न्दु | कु | सु | मा | न्य | ल | का | न्ताः |
| र | न | भ | ग | ग | ||||||
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