मल्लिनाथः
चक्रुरेवेति ॥ स्पर्शलोभवशेनोरुस्पर्शतृष्णापारतत्र्येण लोलकराणां चपलपाणीनां कामिनामनिभृतान्यनर्पितान्यपि नखानि कररुहाः । `पुनर्भवः कररुहो&#३२; नखोऽस्त्री नखरोऽस्त्रियाम्` इत्यमरः । रम्भास्तम्भकोमलतलेषु कदलीप्रकाण्डपेलवस्वरूपेषु ललनानामूरुषु राजीः रेखाश्चक्रुरेव । ऊरुपरामर्शानान्तरीयकनखस्पर्शमात्रादेव रेखा जाता इत्यर्थः । अत्र कोमलतायाः विशेषणगत्या राजीकरणहेतुत्वाकाव्यलिङ्गभेदः
छन्दः
स्वागता [११: रनभगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| च | क्रु | रे | व | ल | ल | नो | रु | षु | रा | जीः |
| स्प | र्श | लो | भ | व | श | लो | ल | क | रा | णाम् |
| का | मि | ना | म | नि | भृ | ता | न्य | पि | र | म्भा |
| स्त | म्भ | को | म | ल | त | ले | षु | न | खा | नि |
| र | न | भ | ग | ग | ||||||
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