यत्प्रियव्यतिकराद्वनितान-
मङ्गजेन पुलकेन बभूवे ।
प्रापि तेन भृशमुच्छ्वसिभि-
र्नीविभिः सपदि बन्धनमोक्षः ॥
यत्प्रियव्यतिकराद्वनितान-
मङ्गजेन पुलकेन बभूवे ।
प्रापि तेन भृशमुच्छ्वसिभि-
र्नीविभिः सपदि बन्धनमोक्षः ॥
मङ्गजेन पुलकेन बभूवे ।
प्रापि तेन भृशमुच्छ्वसिभि-
र्नीविभिः सपदि बन्धनमोक्षः ॥
मल्लिनाथः
यदिति ॥ वनितानां स्त्रीणां प्रियस्य भर्तुः व्यतिकरात्संपर्कात् संगमाच्चाङ्गजेनाङ्गव्यापिना पुत्रेण च पुलकेन बभूवे भूतमिति यत् । भावे लिट् । तेन पुलकोदयेन पुत्रोदयेन च भृशमुच्छसिताभिरुच्छिन्नाभिर्मोक्षाशया आश्वसिताभिश्च नीविभिः लक्षणया कटिवस्त्रैः अन्यथा बन्धनशब्देन पौनरुक्त्यात् । सपदि बन्धनमोक्षो ग्रन्थिभेदो निगडमोचनं च प्रापि प्राप्तः । कर्मणि लुङ् । अभ्युदयेषु राजानो बद्धान् मोचयन्तीति भावः । अत्र प्रकृतपुलकनीविगताङ्गजत्वोच्छ्वसितत्वादिविशेषणसाम्यावन्धनमोक्षणसंबन्धाच्च अप्रकृतपुत्रकारागतिप्रतीतेः समासोक्तिरलंकारः
छन्दः
स्वागता [११: रनभगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| य | त्प्रि | य | व्य | ति | क | रा | द्व | नि | ता | न |
| म | ङ्ग | जे | न | पु | ल | के | न | ब | भू | वे |
| प्रा | पि | ते | न | भृ | श | मु | च्छ्व | सि | भि | |
| र्नी | वि | भिः | स | प | दि | ब | न्ध | न | मो | क्षः |
| र | न | भ | ग | ग | ||||||
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