बिम्बितं बृतपरिस्रुति जान-
न्भाजने जलजमित्यबलायाः ।
घ्रातुमक्षि पतति भ्रमरः स्म
भ्रान्तिभाजि भवति क्व विवेकः ॥
बिम्बितं बृतपरिस्रुति जान-
न्भाजने जलजमित्यबलायाः ।
घ्रातुमक्षि पतति भ्रमरः स्म
भ्रान्तिभाजि भवति क्व विवेकः ॥
न्भाजने जलजमित्यबलायाः ।
घ्रातुमक्षि पतति भ्रमरः स्म
भ्रान्तिभाजि भवति क्व विवेकः ॥
छन्दः
स्वागता [११: रनभगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| बि | म्बि | तं | बृ | त | प | रि | स्रु | ति | जा | न |
| न्भा | ज | ने | ज | ल | ज | मि | त्य | ब | ला | याः |
| घ्रा | तु | म | क्षि | प | त | ति | भ्र | म | रः | स्म |
| भ्रा | न्ति | भा | जि | भ | व | ति | क्व | वि | वे | कः |
| र | न | भ | ग | ग | ||||||
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