संप्रवेष्टुमिव योषित ईषुः
श्लिष्यतां हृदयमिष्टतमानाम् ।
आत्मनः सततमेव तदन्त-
र्वर्तिनो न खलु नूनमजानन् ॥
संप्रवेष्टुमिव योषित ईषुः
श्लिष्यतां हृदयमिष्टतमानाम् ।
आत्मनः सततमेव तदन्त-
र्वर्तिनो न खलु नूनमजानन् ॥
श्लिष्यतां हृदयमिष्टतमानाम् ।
आत्मनः सततमेव तदन्त-
र्वर्तिनो न खलु नूनमजानन् ॥
मल्लिनाथः
&#३२; संप्रवेष्टुमिति ॥ योषितः श्लिष्यतामालिङ्गतामिष्टतमानां हृदयं संप्रवेष्टुमीषुरिच्छन्ति स्मेव इति गाढालिङ्गननिमित्ता क्रियास्वरूपोत्प्रेक्षा गुणस्वरूपोत्प्रेक्षा वा विवक्षाभेदात् । अत एवात्मनः स्वान् सततमेव तदन्तर्वर्तिनस्तेषामिष्टतमानां अन्तर्हृदयेष्वेव स्थितान्नाजानन्नूनम् । अन्यथा कथं पुनः प्रवेशेच्छेति भावः । इयमज्ञानोत्प्रेक्षा पूर्वोत्प्रेक्षासापेक्षेति सजातीयसंकरः
छन्दः
स्वागता [११: रनभगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| सं | प्र | वे | ष्टु | मि | व | यो | षि | त | ई | षुः |
| श्लि | ष्य | तां | हृ | द | य | मि | ष्ट | त | मा | नाम् |
| आ | त्म | नः | स | त | त | मे | व | त | द | न्त |
| र्व | र्ति | नो | न | ख | लु | नू | न | म | जा | नन् |
| र | न | भ | ग | ग | ||||||
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