संजहार सहसा परिरब्ध-
प्रेयसीषु विरहय्य विरोधम् ।
संहितं रतिपतिः स्मितभिन्न-
क्रोधमाशु तरुणेषु महेषुम् ॥
संजहार सहसा परिरब्ध-
प्रेयसीषु विरहय्य विरोधम् ।
संहितं रतिपतिः स्मितभिन्न-
क्रोधमाशु तरुणेषु महेषुम् ॥
प्रेयसीषु विरहय्य विरोधम् ।
संहितं रतिपतिः स्मितभिन्न-
क्रोधमाशु तरुणेषु महेषुम् ॥
मल्लिनाथः
&#३२; संजहारेति ॥ तरुणेषु युवसु विरोधं प्रणयकलहं विरहय्य विहाय । रहयतेः स्वार्थण्यन्तात् क्त्वा तस्य ल्यप् `ल्यपि लघुपूर्वात्` (अष्टाध्यायी ६.४.५६ ) इत्ययादेशः। सहसा परिरब्धाः प्रेयस्यो यैस्तेषु परिरब्धप्रेयसीषु आश्लिष्टवधूकेषु सत्सु । `ईयसश्च` (अष्टाध्यायी ५.४.१५६ ) इति कपोऽभावः । `ईयसो बहुव्रीहौ प्रतिषेधो वक्तव्यः` (वा०) इत्युपसर्जनस्य ह्रस्वनिषेधः । रतिपतिः कामः संहितं प्रागारोपितं महेषु महान्तं शरं स्मितभिन्नक्रोधं स्वयत्नसाफल्यात् स्मितेनोज्झितपूर्वरोषं च यथा तथा आशु संजहार । सिद्धेऽर्थे साधनानवकाशादित्यर्थः । परिरम्भान्तो यूनां विरह इति भावः
छन्दः
स्वागता [११: रनभगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| सं | ज | हा | र | स | ह | सा | प | रि | र | ब्ध |
| प्रे | य | सी | षु | वि | र | ह | य्य | वि | रो | धम् |
| सं | हि | तं | र | ति | प | तिः | स्मि | त | भि | न्न |
| क्रो | ध | मा | शु | त | रु | णे | षु | म | हे | षुम् |
| र | न | भ | ग | ग | ||||||
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