मल्लिनाथः
अंशुकमिति ॥ अंशुकमुत्तरीयं हृतवता परिणेत्रा भर्त्रा तन्वोः कृशयोः बाह्वोः स्वस्तिको बन्धविशेषः तेनापिहिते आच्छादिते मुग्धे सुन्दरे कुचाग्रे यस्याः सा तथोक्ता । अचिरोढा नवोढा । भिन्नानि शङ्खस्य वलयानि यस्मिन्कर्मणि तद्यथा तथा रभसाद्वेगात्पर्यरम्भि । गाढमाश्लिष्टेत्यर्थः । रभेर्ण्यन्तात्कर्मणि लुङ् । `रभेरशब्लिटोः` (अष्टाध्यायी ७.१.६३ ) इति नुमागमः । एषा तिरोहितमुग्धा
छन्दः
स्वागता [११: रनभगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अं | शु | कं | हृ | त | व | ता | त | नु | बा | हु |
| स्व | स्ति | का | पि | हि | त | मु | ग्ध | कु | चा | ग्रा |
| भि | न्न | श | ङ्ख | व | ल | यं | प | रि | णे | त्रा |
| प | र्य | र | म्भि | र | भ | सा | द | चि | रो | ढा |
| र | न | भ | ग | ग | ||||||
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