मल्लिनाथः
शङ्कयेति ॥ वनिताभिरन्ययुवतौ सपत्न्यां शङ्कया तत्सङ्गशङ्कामात्रेण दयितः स्फुटमेव निश्चितवदेव प्रत्यभेदि । सिद्धवत्कृत्वोद्घाटित इत्यर्थः । अनुचितोऽयमविमृश्य मिथ्याभियोग इति शङ्कां परिहरति-नेति । मत्सरेण वैरेण हता संवृतिर्गोप्यगोपनं यस्य तच्चेतस्तत्त्वविचारे भूतार्थचिन्तायां क्षमं सहिष्णु न भवति । मत्सरग्रस्तचेतसामेष स्वभाव इति भावः । सामान्येन विशेषसमर्थनरूपोऽर्थान्तरन्यासः
छन्दः
आर्यागीतिः []
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| श | ह | ङ्ग | या | न्य | यु | व | तौ | व | |||||
| नि | ता | भिः | प्र | त्य | भे | दि | द | यि | तः | स्फु | ट | मे | व |
| न | क्ष | मं | भ | व | ति | त | त्व | वि | |||||
| चा | रे | म | त्स | रे | ण | ह | त | सं | वृ | ति | चे | तः |
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