मल्लिनाथः
उद्धतैरिति ॥ उद्धतैर्दृप्तैरिव कुचकुम्भैः परसरसङ्गादन्योन्यसंघर्षादुभयत ईरितान्याकृष्टानि तथा विभ्रमातिशयं विलासविशेषं पुष्णन्ति तानि । `नपुंसकस्य झलचः` (अष्टाध्यायी ७.१.७२ ) इति मुमागमः । योषितां वपूंषि । पूर्ववन्नुमागमः । `सान्तमहतः संयोगस्य` (अष्टाध्यायी ६.४.१० ) इति दीर्घ इति विशेषः । अतिमदेन जुघूर्णः भ्रेमुः । दृप्तसंघर्षस्तटस्थपीडाकरः । यथा वृषभकलहाद्वत्सपादभङ्ग इति भावः
छन्दः
स्वागता [११: रनभगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| उ | द्ध | तै | रि | व | प | र | स्प | र | स | ङ्गा |
| दी | रि | ता | न्यु | भ | य | तः | कु | च | कु | म्भैः |
| यो | षि | ता | म | ति | म | दे | न | जु | घू | र्णु |
| र्वि | भ्र | मा | ति | श | य | पुं | सि | व | पूं | षि |
| र | न | भ | ग | ग | ||||||
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