मद्यमन्दविगलत्त्रपमीष-
च्चक्षुरुन्मिषितपक्ष्म दधत्या ।
वीक्ष्यते स्म शनकैर्नववध्वा
कामिनोमुखमधोमुखयैव ॥
मद्यमन्दविगलत्त्रपमीष-
च्चक्षुरुन्मिषितपक्ष्म दधत्या ।
वीक्ष्यते स्म शनकैर्नववध्वा
कामिनोमुखमधोमुखयैव ॥
च्चक्षुरुन्मिषितपक्ष्म दधत्या ।
वीक्ष्यते स्म शनकैर्नववध्वा
कामिनोमुखमधोमुखयैव ॥
मल्लिनाथः
मद्येति ॥ मद्येन मद्यपानेन मन्दमल्पं विगलन्ती त्रपा यस्य तत् । अत एवेषदुन्मिषितानि पक्ष्माणि लोमानि यस्य तच्चक्षुर्दधत्या नववध्वा नवोढया कामिनः प्रियस्य मुखमधोमुखयैव नमितवदनयैव । `स्वाङ्गाच्चोपसर्जनात्-` (अष्टाध्यायी ४.१.५४ ) इति विकल्पादनीकारः । शनकैरसंभ्रमेण वीक्ष्यते स्म । तिर्यगीक्षितमित्यर्थः । अत्रापि मदमानाभ्यां त्रपैव बलीयसीति मौग्ध्यातिशयोक्तिः । `समुद्यद्यौवना मुग्धा लज्जापिहितमन्मथा`
छन्दः
स्वागता [११: रनभगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| म | द्य | म | न्द | वि | ग | ल | त्त्र | प | मी | ष |
| च्च | क्षु | रु | न्मि | षि | त | प | क्ष्म | द | ध | त्या |
| वी | क्ष्य | ते | स्म | श | न | कै | र्न | व | व | ध्वा |
| का | मि | नो | मु | ख | म | धो | मु | ख | यै | व |
| र | न | भ | ग | ग | ||||||
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