निसर्गचित्रोज्वलसूक्ष्मपक्ष्मणा
लसद्बिसच्छेदसिताङ्गसङ्गिना ।
चकासतं चारुचमूरुचर्मणा
कुथेन नागेन्द्रमिवेन्द्रवाहनम् ॥
निसर्गचित्रोज्वलसूक्ष्मपक्ष्मणा
लसद्बिसच्छेदसिताङ्गसङ्गिना ।
चकासतं चारुचमूरुचर्मणा
कुथेन नागेन्द्रमिवेन्द्रवाहनम् ॥
लसद्बिसच्छेदसिताङ्गसङ्गिना ।
चकासतं चारुचमूरुचर्मणा
कुथेन नागेन्द्रमिवेन्द्रवाहनम् ॥
मल्लिनाथः
निसर्गेति ॥ पुनः निसर्गात्स्वभावादेव चित्राणि शबलान्युज्वलानि भास्वराणि सूक्ष्माणि पक्ष्माणि लोमानि यस्य तेन लसन् यो बिसच्छेदो मृणालखण्डः । `छेदः खण्डोऽस्त्रियाम्` इति त्रिकाण्डशेषः । तद्वत्सितेऽङ्गे वपुषि सङ्गिना सक्तेन चारुणा मनोहरेण चमूरुचर्मणा मृगत्वचा कुथेन पृष्ठास्तरणेन । `प्रवेण्यास्तरणं वर्णः परिस्तोमः कुथो द्वयोः` इत्यमरः । इन्द्रवाहनं नागेन्द्रमैरावतमिव चकासतं शोभमानम् । इन्द्रस्य वाहनमिति स्वस्वामिभावमात्रस्य विवक्षितत्वात् `वाहनमाहितात्` (अष्टाध्यायी ८.४.८ ) इति न णत्वम् । यथाह वामनः -`नेन्द्रवाहनशब्दे णत्वमाहितत्वस्याविवक्षितत्वात्` इति । चकासतेः शतरि `नाभ्यस्ताच्छतुः` (अष्टाध्यायी ७.१.७८ ) इति नुमभावः । `जक्षित्यादयः षट्` (अष्टाध्यायी ६.१.६ ) इत्यभ्यस्तसंज्ञा
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| नि | स | र्ग | चि | त्रो | ज्व | ल | सू | क्ष्म | प | क्ष्म | णा |
| ल | स | द्बि | स | च्छे | द | सि | ता | ङ्ग | स | ङ्गि | ना |
| च | का | स | तं | चा | रु | च | मू | रु | च | र्म | णा |
| कु | थे | न | ना | गे | न्द्र | मि | वे | न्द्र | वा | ह | नम् |
| ज | त | ज | र | ||||||||
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