बलावलेपादधुनापिपूर्वव-
प्रबाद्ध्यते तेन जगज्जिगीषुणा ।
सतीव योषित्प्रकृतिः सुनिश्चला
पुमांसंमब्येति भवान्तरेष्वपि ॥
बलावलेपादधुनापिपूर्वव-
प्रबाद्ध्यते तेन जगज्जिगीषुणा ।
सतीव योषित्प्रकृतिः सुनिश्चला
पुमांसंमब्येति भवान्तरेष्वपि ॥
प्रबाद्ध्यते तेन जगज्जिगीषुणा ।
सतीव योषित्प्रकृतिः सुनिश्चला
पुमांसंमब्येति भवान्तरेष्वपि ॥
मल्लिनाथः
बलेति ॥ जिगीषुणा । नित्योत्साहवतेत्यर्थः । तेन शिशुपालेन बलावलेपाद्वलगर्वादधुनापि पूर्ववत् पूर्वजन्मनीव जगत् प्रबाध्यते । तथा हि—सती पतिव्रता योषिदिव सुनिश्चलाऽतिस्थिरा प्रकृतिः स्वभावो भवान्तरेषु जन्मान्तरेष्वपि पुमांसमभ्येति । `पति या नाभिचरति मनोवाक्कायसंयता। सा भर्तुर्लोकमाप्नोति सद्भिः साध्वीति चोच्यते ॥` इति मनुः (५।६५)। उपमोपमेयपुरस्कृतोऽर्थान्तरन्यासः
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ब | ला | व | ले | पा | द | धु | ना | पि | पू | र्व | व |
| प्र | बा | द्ध्य | ते | ते | न | ज | ग | ज्जि | गी | षु | णा |
| स | ती | व | यो | षि | त्प्र | कृ | तिः | सु | नि | श्च | ला |
| पु | मां | सं | म | ब्ये | ति | भ | वा | न्त | रे | ष्व | पि |
| ज | त | ज | र | ||||||||
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