स्वयं विधाता सुरदैत्यरक्षसा-
मनुग्रहावग्रहयोर्यदृच्छया ।
दशाननादीनभिराद्धदैवता-
वितीर्णवीर्यातिशयान्हसत्यसौ ॥
स्वयं विधाता सुरदैत्यरक्षसा-
मनुग्रहावग्रहयोर्यदृच्छया ।
दशाननादीनभिराद्धदैवता-
वितीर्णवीर्यातिशयान्हसत्यसौ ॥
मनुग्रहावग्रहयोर्यदृच्छया ।
दशाननादीनभिराद्धदैवता-
वितीर्णवीर्यातिशयान्हसत्यसौ ॥
मल्लिनाथः
स्वयमिति ॥ यदृच्छया स्वेच्छया स्वयं सामर्थेन । न तु देवताप्रसादबलादिति भावः । सुरदैत्यरक्षसां देवदानवयातुधानानां अनुग्रहावग्रहयोः प्रसादनिग्रहयोर्विधाता कर्ता असौ शिशुपालः अभिराद्धाभिराराधिताभिः, देवताभिरीश्वरादिभिः वितीर्णो दत्तो वीर्यातिशयः प्रभावातिशयो येषां तान् दशाननादीन् हसति ।अनन्यप्रसादलब्धैश्वर्ये मयि कथं याचकैस्तुल्यतेति गर्वात् हसतीत्यर्थः
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| स्व | यं | वि | धा | ता | सु | र | दै | त्य | र | क्ष | सा |
| म | नु | ग्र | हा | व | ग्र | ह | यो | र्य | दृ | च्छ | या |
| द | शा | न | ना | दी | न | भि | रा | द्ध | दै | व | ता |
| वि | ती | र्ण | वी | र्या | ति | श | या | न्ह | स | त्य | सौ |
| ज | त | ज | र | ||||||||
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