स्मरत्यदो दाशरथिर्भवानमुं
वनान्ताद्वनितापहारिणम् ।
पयोधिमाबद्धचलज्जलाबिलं
विलङ्घ्यलङ्गां निकषा हनिष्यति ॥
स्मरत्यदो दाशरथिर्भवानमुं
वनान्ताद्वनितापहारिणम् ।
पयोधिमाबद्धचलज्जलाबिलं
विलङ्घ्यलङ्गां निकषा हनिष्यति ॥
वनान्ताद्वनितापहारिणम् ।
पयोधिमाबद्धचलज्जलाबिलं
विलङ्घ्यलङ्गां निकषा हनिष्यति ॥
मल्लिनाथः
स्मरतीति ॥ भातीति भवान् । भातेर्डवतुः । दशरथस्यापत्यं पुमान्दाशरथिः । `अत इञ्` (अष्टाध्यायी ४.१.९५ ) इतीञ्प्रत्ययः । भवन् । रामः सन्नित्यर्थः । भवतेर्लटः शत्रादेशः । वनान्ताद्दण्डकारण्याद्वनितापहारिणं सीतापहर्तारममुं रावणम् । आबद्धः प्रक्षिप्ताद्रिभिर्बद्धसेतुः अत एव चलन्ति जलानि यस्य स च अत एव आविलश्च तं आबद्धचलज्जलाविलं पयोधिं विलङ्घ्य लङ्कां निकषा लङ्कासमीपे । "समयानिकषाशब्दौ सामीप्ये त्वव्यये मतौ` इति हलायुधः । `अभितःपरित:समयानिकषाहाप्रतियोगेष्वपि` (वा०) इति द्वितीया । हनिष्यति अवधीत् । `अभिज्ञावचने लृट्` (अष्टाध्यायी ३.२.११२ ) इति भूते लृट् । अदो हननं भवान्स्मरतीति काकुः । प्रत्यभिजानासि किमित्यर्थः । शेषे प्रथमः
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| स्म | र | त्य | दो | दा | श | र | थि | र्भ | वा | न | मुं |
| व | ना | न्ता | द्व | नि | ता | प | हा | रि | णम् | ||
| प | यो | धि | मा | ब | द्ध | च | ल | ज्ज | ला | बि | लं |
| वि | ल | ङ्घ्य | ल | ङ्गां | नि | क | षा | ह | नि | ष्य | ति |
| ज | त | ज | र | ||||||||
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